कार्यस्थल पर शांत कैसे रहें

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज

रोज़मर्रा के जीवन से गुज़रते हुए, हम शायद ही कभी अपने शब्दों या कार्यों की ओर ध्यान देते हैं। जो कुछ भी हो रहा होता है, हम उसके लिए बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देते हैं और परिणाम के बारे में ज़रा सा भी ख़याल नहीं करते। कभी कार्यस्थल पर कोई व्यक्ति ऐसा कुछ करता है जो हमें पसंद नहीं आता, तो हम उन पर गुस्सा करने लगते हैं। कभी कोई व्यक्ति गलती कर देता है, तो हम उन्हें नीचा दिखाने लगते हैं। हम फ़ौरन ही वो सबकुछ कहने और करने लगते हैं जो हमारे मन में आता जाता है, और अपने शब्दों और कार्यों के असर के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचते। हम सामने वाले के बारे में सोचने का समय ही नहीं निकालते, और इस बात पर विचार ही नहीं करते कि उन्होंने जो कहा या करा है, उसके पीछे वजह क्या है। हम घंटों, दिनों, हफ़्तों, महीनों, और कई बार तो सालों, तक उनके प्रति गुस्से से भरपूर रहते हैं।

calm cooperative workers in office

ज़रा सोचिए, कार्यस्थल पर कितनी बार लोग एक-दूसरे के बारे में गुस्से से भरपूर विचार रखते हैं। विचार बहुत शक्तिशाली होते हैं और इनकी तरंगें दूसरों तक भी पहुँचती हैं।

ज़रा सोचिए, कितनी ही बार हम दूसरों को कुछ ऐसा बोल देते हैं जो उन्हें तकलीफ़ पहुँचाता है। उसकी भी तरंगें होती हैं। कहा जाता है कि गुस्से भरे बोलों के घाव, शारीरिक घावों से भी अधिक तकलीफ़ पहुँचाते हैं। शब्दों से सामने वाले के दिल पर ज़ख्म लगता है, जिसे भरने में शारीरिक ज़ख्म से कहीं ज़्यादा समय लगता है।

यह अचरज की बात है कि अधिकतर लोग अपने वचनों और कार्यों की ओर ध्यान दिए बिना ही जीवन गुज़ार देते हैं। पूरी ज़िंदगी लोग ऐसी बातें कहते और ऐसे कार्य करते रहते हैं जिनसे दूसरों को तकलीफ़ पहुँचती है, लेकिन फिर भी वो कभी परिणाम के बारे में नहीं सोचते।

हमारे शब्दों की ताकत

हम शायद सोचते हों कि दूसरों पर गुस्सा निकालने से और उन्हें भला-बुरा कहने से हमें कुछ नहीं होगा, लेकिन सच तो यह है कि हम बच नहीं सकते। अगर हम दूसरों के साथ बुरा बर्ताव करेंगे, या हम उन्हें तकलीफ़ पहुँचायेंगे, तो संभावना यही है कि वो भी प्रतिक्रिया करेंगे और हम उनके गुस्से का शिकार हो जायेंगे।

हम दूसरों के शब्दों या कार्यों पर कोई नियंत्रण नहीं कर सकते। लेकिन हम दूसरों को लेकर अपनी प्रतिक्रियाओं पर अवश्य नियंत्रण कर सकते हैं। कार्यस्थल में, जब लोग हमारे साथ झगड़ा या बहस करते हैं, तो हमारे पास दो विकल्प होते हैं – हम या तो बदले में उन्हें भी तकलीफ़ पहुँचा सकते हैं, या हम उन्हें क्षमा कर सकते हैं। बदले की भावना रखकर अपने बुरे विचारों, शब्दों, और कार्यों का भार बढ़ाने के बजाय, हम उन्हें माफ़ कर सकते हैं। इस तरह, हम दूसरों के नकारात्मक शब्दों और कार्यों के सामने भी स्वयं को शांत रख सकते हैं।

जब हम क्षमा कर देते हैं, तो हम अपनी भी शारीरिक और मानसिक सहायता करते हैं।

जीवन में हमें कई निराशाएँ और चुनौतियाँ मिलती हैं। दूसरों के गलत बर्ताव का शिकार होने के साथ-साथ हम अक्सर अपने ख़ुद के गुस्से का भी शिकार हो जाते हैं। जब हम दूसरों की ज़्यादती की प्रतिक्रिया में गुस्सा होते हैं, तो हमें दोहरी तकलीफ़ सहनी पड़ती है। एक तो हम उस पीड़ा से गुज़र रहे होते हैं जो सामने वाले ने हमें दी होती है। दूसरे, हमें अपने स्वयं के क्रोध से उत्पन्न होने वाली पीड़ा को भी सहना पड़ता है।

कार्यस्थल पर जब हमें गुस्सा आता है, तो वो न केवल हमें भावनात्मक रूप से तकलीफ़ पहुँचाता है, बल्कि हमारे शरीर पर भी बुरा असर डालता है। इससे तनाव पैदा होता है, जिससे फिर तनाव-संबंधी बीमारियों के होने का ख़तरा बढ़ जाता है। इससे हृदयरोग, कैंसर, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप, और अन्य रोगों के होने की संभावना में बढ़ोतरी होती है।

क्रोध पर काबू पाने के लिए हमें बहुत ज़्यादा ताकत की ज़रूरत होती है। हम चाहे सोच सकते हैं कि जो व्यक्ति क्रोधित हो रहा है, वो बहुत ताकतवर है, पर असल में वो कमज़ोर हैं क्योंकि वो अपने क्रोध से हार चुका है। जिस व्यक्ति ने अपने क्रोध पर काबू पा लिया है, वही असल में सबसे ज़्यादा ताकतवर है।

बदले में प्रतिक्रिया करना हमें कैसे नुकसान पहुँचाता है

जब भी हमारे अंदर उन लोगों के प्रति गुस्सा या बदले की भावना जन्म ले जिन्होंने हमें मन, वचन, या कर्म से चोट पहुँचाई है, तो हमें रुककर सोचना चाहिए, और ख़ुद की शांति के लिए उन्हें माफ़ कर देना चाहिए।

आइए देखें कि जब हम अपने बॉस, अपने सहकर्मियों, या अपने नीचे काम करने वाले लोगों को क्षमा नहीं करते हैं, तो क्या होता है। हम में से हरेक की व्यक्तिगत कहानी में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होता है जबकि ऑफ़िस में किसी व्यक्ति की कोई बात या कोई कार्य हमें पसंद नहीं आता है। हो सकता है कि किसी ने हमारे साथ कुछ गलत किया हो। हो सकता है कि किसी ने हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचाई हो या हमें शारीरिक रूप से तकलीफ़ दी हो। हो सकता है कि किसी ने हमसे कुछ छीन लिया हो। हो सकता है कि किसी ने हमें धोखा दिया हो या हमसे झूठ बोला हो। हो सकता है कि जिस पर हम भरोसा करते थे, उसने हमारा भरोसा तोड़ दिया हो। हो सकता है कि किसी ने हमारी ताकत, पद, या दौलत हमसे छीन ली हो। दो लोगों के बीच की समस्या की कोई न कोई जड़ अवश्य होती है।

इतना तो निश्चित तौर पर कहा ही जा सकता है कि हम में से हरेक के साथ ऐसी कोई न कोई घटना अवश्य हुई होती है जो हमें पसंद नहीं होती या जो जिसने हमें तकलीफ़ पहुँचाई होती है। फिर क्या होता है? हम परेशान, चिड़चिड़े, और क्रोधित हो जाते हैं। जो कुछ हुआ है, हम उसके बारे में सोचते रहते हैं। हमें वो अच्छा नहीं लगता लेकिन हम उसे भूल भी नहीं पाते, और उसके बारे में बार-बार सोचते रहते हैं। कई बार हम उसके बारे में बार-बार बात भी करते रहते हैं, या तो उसी व्यक्ति से जिसने हमें तकलीफ़ पहुँचाई है या फिर दूसरों से। कुछ लोग जिनका अपने ऊपर नियंत्रण कम होता है, वो उस व्यक्ति को शारीरिक रूप से भी चोट पहुँचा सकते हैं, या किसी और के ऊपर अपना गुस्सा निकाल सकते हैं।

जब कार्यस्थल में हमारे साथ हुई घटना बढ़ती चली जाती है, तो हम पाते हैं कि हमारे विचार और शब्द उस परिस्थिति को सुलझाने के बारे में व्यस्त हो जाते हैं। कुछ लोग उस व्यक्ति के साथ बातचीत करके समस्या को शांतिपूर्वक सुलझाना चाहते हैं जिसने उन्हें तकलीफ़ पहुँचाई होती है। कई बार जब हम ऐसा करते हैं, तो सामने वाला हमारी बात सुनने के लिए तैयार नहीं होता। तब हमें लगता है कि हमें और बड़ा कदम उठाना पड़ेगा। इससे बदले की भावना उत्पन्न होती है। हम उस व्यक्ति से बदला लेने के या हिसाब चुकाने के तरीके सोचने लगते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे साथ इंसाफ़ हो। हमारा मन तब तक उस घटना को भूलता ही नहीं जब तक कि हम बदला नहीं ले लेते। इस तरह, उस एक घटना से और अधिक घटनाएँ व प्रतिक्रियाएँ बढ़ती चली जाती हैं। फिर सामने वाला व्यक्ति फिर से हमसे बदला लेता है। इस प्रकार, क्रिया और प्रतिक्रिया की कड़ी बढ़ती ही चली जाती है, और वो पहले वाली शुरुआती घटना एक बड़ी समस्या में बदल जाती है।

इस सबके बीच होता क्या है? हम अपने मन की शांति खो बैठते हैं। वो शुरुआती घटना तो शायद कुछ क्षणों, या कुछ घंटों, या एक दिन की होती है, लेकिन उसे मन ही मन जीते हुए और बदले के बारे में सोचते हुए हम सैकड़ों घंटे ज़ाया कर देते हैं। इस सबके बीच हम अपनी ज़िंदगी के कितने ही अनमोल क्षण गँवा देते हैं। जो चीज़ हमारी मदद कर सकती है, उस ओर ध्यान देने के बजाय हम एक बुरी पिक्चर को बार-बार देखने में ही अपना वक़्त ज़ाया कर देते हैं। इस तरह हम उस व्यक्ति से भी ज़्यादा नुकसान में रहते हैं जिस पर हम गुस्सा हो रहे होते हैं।

पीड़ादायी क्षणों को बार-बार न जियें

क्षमा से खाली जीवन ऐसा ही होता है मानो किसी सीडी या डीवीडी में कोई बुरा दृश्य बार-बार चल रहा हो। हम में से कितने लोग एक बुरी फ़िल्म को बार-बार देखना चाहते हैं, या किसी ऐसे गाने को बार-बार सुनना चाहते हैं जो हमें पसंद न हो? हम में से कितने लोग ऐसा भोजन बार-बार करना चाहते हैं जो हमें पसंद न हो? ज़्यादातर तो हम यही कहते हैं, “इसका स्वाद बिल्कुल ख़राब है।” ऐसा ही तब होता है जब हम अपने साथ हुई बुरी घटना को मन ही मन बार-बार दोहराते रहते हैं।

हम में से अधिकतर लोग न केवल अपने साथ हुई घटना के बारे में सोचते रहते हैं, लेकिन कल्पना में उसका कोई और अंत भी सोचते रहते हैं, जिसमें हमारे साथ न्याय होता है और सामने वाले को उसके दुष्कर्म की सज़ा मिलती है। हम समय में पीछे जाकर उस घटना को होने से तो नहीं रोक सकते। लेकिन हम ये कह सकते हैं कि “जो होना था वो हो चुका, अब हमें इसे यहीं ख़त्म कर देना चाहिए।” या हम बदला ले सकते हैं और कह सकते हैं कि “मुझे सामने वाले से बदला अवश्य लेना है, इसीलिए मैं उसकी प्रतिक्रिया का ख़तरा मोल लेने को तैयार हूँ।” क्या हम माफ़ न करके और बदला लेकर अपनी पीड़ा को और अधिक बढ़ाना चाहते हैं? ये तो ऐसे ही हुआ जैसे हम वॉशिंग मशीन में कपड़े धोकर उन्हें साफ़ करना चाहते हैं, लेकिन साबुन या डिटर्जेन्ट डालने के बजाय हम उसमें और अधिक मिट्टी डाल रहे हैं। ऐसे में हमारे कपड़े साफ़ कैसे होंगे?

अगर हमारे कार्यस्थल पर किसी ने हमें तकलीफ़ पहुँचाई है, तो हम उन्हें माफ़ करने का या उनसे बदला लेने का विकल्प चुन सकते हैं। यह चुनाव हमने ही करना है।

प्रतिशोध आपके शरीर को नुकसान पहुँचाता है

जब हम क्षमा की विपरीत भावनाओं में उलझ जाते हैं, जैसे क्रोध, नफ़रत, और प्रतिशोध, तो हम अपने शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। ये भावनाएँ हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं।

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डॉक्टर्स और मेडिकल शोधकर्ता इस बात को मानने लगे हैं कि क्रोध और घृणा का असर बहुत हानिकारक होता है। आइए हम इसके कारणों का विश्लेषण करें।

सबसे पहले, हमारे शरीर में कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएँ अंतर्निहित हैं जो हमारी प्रजाति की सुरक्षा के लिए उत्पन्न हुई हैं। जब एक जीवित प्राणी को कोई ख़तरा महसूस होता है, तो उसके शरीर में प्रतिक्रिया-स्वरूप कुछ हॉर्मोनल और रसायनिक बदलाव होते हैं। ये हॉर्मोन हमें उस परिस्थिति से लड़ने या भागने के लिए प्रेरित करते हैं। ये हमारे शरीर को ताकत और फुर्ती प्रदान करते हैं, ताकि हम तेज़ी से दौड़ सकें या किसी अन्य तरीके से अपनी रक्षा कर सकें। लेकिन जब हम रोज़मर्रा की साधारण समस्याओं को ही बहुत अधिक गंभीरता से लेने लगते हैं, जोकि असल में हमारे जीवन के लिए ख़तरा नहीं होती हैं, तो हमारे शरीर में उत्पन्न होने वाले लड़ो-या-भागो हॉर्मोनों का कोई जायज़ इस्तेमाल नहीं होता है।

इसका परिणाम यह होता है कि हम न तो लड़ते हैं और न ही भागते हैं, लेकिन हम उत्तेजना अवश्य महसूस कर रहे होते हैं। यह उत्तेजना, क्रोध में बदल जाती है। हम उन परिस्थितियों में भी उत्तेजित और क्रोधित होने लगते हैं जिनमें हमारी ज़िंदगी को कोई ख़तरा नहीं होता है। इससे हमारा शरीर दैनिक जीवन की उन मामूली परिस्थितियों में भी सुरक्षा हॉर्मोनों को उत्पन्न करने लगता है जिनमें वास्तव में इन हॉर्मोनों की ज़रूरत नहीं होती है। क्योंकि इन हॉर्मोनों, जैसे कॉर्टिसोल, की हमारे शरीर को असल में ज़रूरत नहीं होती है, इसीलिए ये हमें नुकसान पहुँचाते हैं।

उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि कॉर्टिसोल के हमारे शरीर में हानिकारक सह-प्रभाव हो सकते हैं, इसीलिए डॉक्टर सावधानी से इसका इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। लेकिन जब हम गुस्से या तनाव में होते हैं, तो हमारे शरीर में प्राकृतिक कॉर्टिसोल उत्पन्न होता है, जिससे तनाव-संबंधी बीमारियाँ पैदा होती हैं। अगर हम हमेशा ही भय, क्रोध, या तनाव की अवस्था में रहते हैं, तो ये हॉर्मोन शरीर के दूसरे अंगों पर बुरा प्रभाव डालने लगते हैं। इससे तनाव-संबंधी रोग, जैसे पाचन समस्याएँ, सिरदर्द, हृदय-रोग, त्वचा-रोग, और साँस की तकलीफ़, होने लगते हैं।

दैनिक जीवन की अनेक चुनौतियों का सामने हम इतनी गंभीरता से करते हैं जैसे कि हमारा जीवन ख़तरे में हो, और फिर हमारे शरीर में ये लड़ो-या-भागो हॉॅर्मोन पैदा होते हैं। लोग तनाव में आ जाते हैं जब सड़क पर कोई उनकी कार को गलत तरीके से ओवरटेक कर आगे निकल जाता है। लोग गुस्से में आ जाते हैं जब कार्यस्थल पर कोई छोटी सी भी गलती करता है। हमारी प्रतिक्रियाएँ लोगों द्वारा की जाने वाली गलतियों के अनुपात में बहुत अधिक बड़ी होती हैं।

सालों पहले, हमें पता नहीं था कि क्रोध और तनाव हमारे शरीर को कितना ज़्यादा नुकसान पहुँचा सकते हैं। लेकिन अब क्योंकि हमें इस बारे में पता है, तो हम स्वयं निर्णय ले सकते हैं कि क्या कार्यस्थल पर छोटी-छोटी बातों पर तनाव में आ जाना इस लायक है कि हम हृदय-रोग, साँस की तकलीफ़, या पाचन संबंधी बीमारियों को न्यौता दें? हमारे शरीर और क्रोध का रिश्ता अब दिन-ब-दिन स्पष्ट होता जा रहा है।

क्षमा ही उत्तर है

घृणा, क्रोध, और बदले की भावना से उत्पन्न होने वाले हॉर्मोनों से शरीर की रक्षा करने का तरीका बहुत आसान हैः क्षमा। क्षमा के द्वारा हम स्वयं को शांत कर सकते हैं, और घृणा व हिंसा की प्रतिक्रियाओं से बच सकते हैं। अक्सर हम अपने कार्यस्थल की छोटी-छोटी समस्याओं का सामना भी इतनी शिद्दत से करते हैं जैसे कि हमारा जीवन ही ख़तरे में हो। ज़रा उन चीज़ों के बारे में सोचिए जो हमें गुस्सा दिलाती हैं। उनमें से कितनी स्थितियों में हमें जान का ख़तरा होता है? उनमें से कितनी स्थितियाँ केवल छोटी खीज के ही लायक होती हैं?

हमें तकलीफ़ पहुँचाने वालों को क्षमा कर देने की आदत डालकर, हम कार्यस्थल में शांत रहने का अभ्यास कर सकते हैं। इस प्रकार, हम क्रोध द्वारा उत्पन्न हॉर्मोनों के दुष्प्रभावों से ख़ुद को बचा सकते हैं। इससे हम देखेंगे कि तनाव-संबंधी रोगों में कमी आई है।

क्षमा का विकास करने के लिए ज़रूरी चीज़ें क्या हैं?

इसके लिए सबसे ज़रूरी है चीज़ों को जाने देना। जब हम माफ़ कर देते हैं और भूल जाते हैं, तो हम अतीत को और उस घटना को जाने देते हैं। हम कहते हैं, “जो कुछ भी हुआ, मैं उसके लिए उस व्यक्ति को माफ़ करता हूँ। और अब मैं इस बारे में भूल जाऊँगा।” इस तरीके से हम उस घटना को जाने देते हैं।

कार्यस्थल पर शांत रहने के लिए क्षमा का विकास करने का एक तरीका है ध्यानाभ्यास। जीवन की समस्याएँ तो कभी ख़त्म नहीं होंगी। लेकिन ध्यानाभ्यास के द्वारा हम अपने ध्यान को अपने अंतर की शांति पर एकत्रित कर सकते हैं, ताकि हम जीवन की समस्याओं से ऊपर उठ सकें।

ध्यानाभ्यास के द्वारा हम अपने अंतर की शांति के संपर्क में आ जाते हैं, जिससे हमें दूसरों को क्षमा करने की, अपने क्रोध पर काबू पाने की, और कार्यस्थल में शांत रहने की शक्ति मिलती है। हम दूसरों को नियंत्रित नहीं कर सकते; लेकिन हम ख़ुद को अवश्य नियंत्रित कर सकते हैं। कार्यस्थल पर हम शांति को चुन सकते हैं, जिससे हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत बेहतर होगी और हमारा जीवन भी अधिक सुखमय रहेगा।